चिकित्सा एवं पथ्यापथ्य

सोवारिग्पा  के अनुसार स्वस्थ शरीर में तीन त्रिदोष,सात शारीरिक संघटक  एवं तीन उत्सर्जक, पांच इंद्रियों का सम्पूर्ण शरीर में समन्वय होता है । त्रिदोष, पांच तत्व, शरीर के मूलभूत ऊतक तत्व, शारीरिक संघटक जीव विज्ञान के रुप में शरीर में उपस्थित है और  उत्सर्जन शरीर के मल हैं ।  स्वास्थ्य हेतु इनका उचित विलोपन होना आवश्क है ।


सोवा रिग्पा के चिकित्सक रोगी के रोग निदान हेतु तीन मुख्य उपकरणों का उपयोग करते हैं यथा - दर्शन स्पर्शन  एवं प्रश्न पूछकर रोग निदान करना । दर्शन निदान में जीभ परीक्षण एवं मूत्र विश्लेषण की दो मुख्य प्रणाली का समावेश किया जाता है । विभिन्न रोगों का निदान प्रकृति,  वर्ण जीभ की स्वच्छता  आदि, जबकि ताजे  मूत्र को विभिन्न तीन स्थितियों पर  विश्लेषण जैसे जब सम शीतोष्ण  रहता है तब इसके वर्ण को देख कर,वर्णपरिवर्तन को देखकर,   वाष्प, गन्ध, बुलबुला अवसाद आदि जांच द्वारा किया जाता है ।


नाड़ी परीक्षण की विकसित तकनीक के द्वारा स्पर्श  के माध्यम से रोग निदान किया जाता है । तापमान,निर्बाधगति  आदि हेतु शरीर को स्पर्श किया जाता है । सोवारिग्पा में नाड़ी एक सबसे महत्वपूर्ण एवं वृहत साधन है जो कि 13 सामान्य विषयों यथा - प्रारंभिक संचालन, परीक्षण हेतु उचित समय, स्थान,  दबाब, तकनीक, मूलभूत नाड़ी, विस्मयकारी नाड़ी, सामान्य एव विनिर्दिष्ट नाड़ी, अन्तकालीन नाड़ी, आदि विश्लेषित है । रोगी से प्रश्न पूछकर रोग निदान करना चिकित्सा का दूसरा रुप है । इसमें रोगी का इतिहास, वर्तमान स्थिति, परिवारिक पृष्ठ भूमि एवं  शरीर में परिवर्तन आदि मुख्य प्रश्न पूछे जाते हैं ।


उपचार प्रणाली के चार वृहत अनुभाग हैं यथा- आहार,व्यवहार, औषधि एवं शल्य वाह्यउपचार । उचित ढंग़ से रोगियों के उपचार हेतु इन चार अनुभागों का सही प्रबन्ध महत्वपूर्ण है।


लघु रोगों का उचित  आहार एवं व्यवहार से उपचार किया जा सकता है। मध्यम स्थिति के रोगियों को औषधि यथा - क्वाथ, चूर्ण, गुटिका, शोधक, वामक द्रव्यों आदि से उपचार किया जा सकता है । अग्रिम स्थिति में रोग शल्य बाह्य चिकित्सा यथा- अग्निकर्म, रक्तमोक्षण, स्वेदन, अभ्यंग, शल्य, आदि के प्रयोग द्वारा रोग साध्य हो  सकता है । इस प्रकार उपरोक्त रोगों की रुपरेखा में उल्लेखित है कि सभी रोग त्रिदोषों के द्वारा होते हैं ।  रोगोपचार भी तीनों दोषों पर आधारित उपचारसंभव है । बौध्द विधि  एवं मन्त्र भी रोगोपचार तथा भेषजीय प्रक्रिया आदि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ।


यह सुविख्यात सत्य है कि रोगियों  के   उपचार में चिकित्सकों की भूमिका महत्वपूर्ण है । अत: चिकित्सक के गुणों एवं आचरण  के पहलुओं पर विशेष जोर देना चाहिए  ।