उद्‍गम

सोवारिग्पा तिब्बती या आमची औषध के रुप में जाना जाता है। आमची औषध हिमालय क्षेत्र के कई भागों में पारंपरिक औषध के रुप में विद्यमान है । सोवारिग्पा का अर्थ है चिकित्सा विज्ञान तथा इस औषध के चिकित्सा अभ्यासी आमची के रुप में जाने जाते हैं । भारत में यह चिकित्सा पध्दति जम्मू कश्मीर के लद्दाख एवं पादरपंगी क्षेत्र, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, दार्जिलिंग = कालिंग पोंग (पश्चिम बंगाल) और अब संपूर्ण भारत में एवं विदेशों में बसे हुए तिब्बती लोगों के बीच यह चिकित्सा विद्यमान है । सोवारिग्पा मूल रुप से भारत से हैं । इस औषधि का मौलिक पाठयपुस्तक चतुसतंत्र भगवान बुध्द द्वारा पच्चीस सौ वर्ष पहले प्रारंभ किया गया था तथा आगे यह प्रसिध्द भारतीय विद्वान जैसे - जीवक, नागार्जुन, वाग्भट्ट एवं चन्द्रानंदन आदि द्वारा विकसित किया गया है । आठवीं शताब्दी में कश्मीरी आचार्य चन्द्रानंदन एवं तिब्बती अनुवादक विरोचन द्वारा चतुसतंत्र का तिब्बती भाषा में अनुवाद किया गया है । लेकिन तिब्बती में इस औषध को प्रस्तुत करने से पहले इसको संशोधित किया गया तथा अन्य पारम्परिक चिकित्सा यथा चीनी, प्रशियन एवं तिब्बती लोक प्रचलित औषध के साथ और अत्यधिक प्रभावकारी एवं तिब्बत के सामाजिक जलवायु स्थिति के अनुरुप उपयुक्त बनाया गया है । तिब्बत के पश्चात् बौध्दधर्म एवं अन्य तिब्बती कला और विज्ञान का प्रभाव पड़ोसी हिमालय क्षेत्रों जैसे मंगोलिया, भूटान, नेपाल, चीन तथा पूर्व सोवियत यूनियन आदि के कुछ भागों में पड़ा तथा सोवारिग्पा भी इन क्षेत्रों में काफी लोकप्रिय हुई । चतुसतंत्र के अतिरिक्त लगभग दो दर्जन भारतीय चिकित्सा पाठय पुस्तकों का संस्कृत से तिब्बती भाषा में अनुवाद किया गया । तिब्बती विद्वानों द्वारा लगभग एक हजार टीका एवं पाठयपुस्तक लिखी गई हैं ।