मूलभूत सिध्दांत

बुध्द के सिध्दांत पुर्नजन्म, कर्म, अस्थिरता एवं प्रतीत समुत्पाद हैं तथा यह माना जाता है कि हम शारीरिक रुप से स्वस्थ हैं या नहीं हम सभी निर्वाण प्राप्त करने तक रोग ग्रस्त रहते हैं । जब कि रोग प्रत्यक्ष रुप में नहीं रहता है । यह हमेशा निद्रावस्था के रुप में उपस्थित रहता है । जब तक कि रोग की उपेक्षा के मूल कारण अज्ञानता का हम त्याग नही कर देते । अज्ञानता त्रिदोष को जन्म देते हैं जो इस प्रकार हैं - निसपा - जिसमें (त्रिदोष) यथा (दोदछगस (काम) वात की जननी, जैसडंग (क्रोध) पित्त का मूलकारण एवं तिमुग (मानसिक मंदता) पाड - कण (कफ) का मूल कारण है चेतन- अचेतन का विश्वव्यापी तथ्यविषयक सामग्री आधारित संगठित है जुंगवाना (अंग्रेजी का पांच तत्व, संस्कृत का पंचमहाभूत) सा, छू,मेई,लुंग एवं नामखा (जो कि पंचमहाभूत के रुप में संगठित है) । भौतिक विज्ञान, विकृति विज्ञान एवं भेषज गुण विज्ञान का यह पध्दति इसी सिध्दांत पर स्थापित है । जिसका अर्थ होता है, हमारा शरीर इन पांचों जुंगवाना का मिश्रण है । जब शरीर में इन तत्वों का असंतुलन हो जाता है तो उसके परिणाम स्वरुप विकार उत्पन्न होता है । विकार उपचार हेतु प्रयुक्त औषधि एवं आहार इन मूलभूत पांच तत्वों का सममिश्रण है । शरीर में यह तत्व नेस्पासुम, लुसजुंग-डुन ( संस्कृत-सप्तधातु) एवं टीमा-सुम के रुप में विद्यमान है । औषधि आहार एवं पेय में यह रो-टुग (षट रस) नुस्पा, योनतन एवं जू -जेस के रुप में है । इस सिध्दान्त के प्रसंग में चिकित्सक, अपनी ज्ञान क्षमता एवं अनुभव के साथ पांच तत्वों के समरुप एवं असमरुप के सिध्दान्त का रोगी के उपचार में प्रयोग करेंगे ।


तत्व की अधिकता से तिक्त स्वाद मे (अग्नि) एवं लुंग (वायु) की अधिकता से तथा कषाय स्वाद सा (पृथ्वी) एवं लुंग (वायु) की अधिकता से नमकीन एवं तिक्त स्वाद लुंग नेस्पा (वायु दोष) को कम कर देता है। क्यों कि वायु दोष लुंग(वायु) तत्व की अधिकता वाला होता है । कटु, मधुर एवं तिक्त रस नेस्पा डीस्पा को कम करता है क्यों कि नेस्पा डीस्पा मे(अग्नि) की अधिकता वाला होता है । तिक्त, खट्टा एवं नमकीन स्वाद नेस्पा पडकन को कम करता है । क्यों कि कफ धातु पृथ्वी एवं जल की अधिकता वाली होती है । औषधियों की समिश्रण समझ हेतु अन्य महत्वपूर्ण तत्व हैं जू-जीसा-सुम (तीन पचनोपरांत स्वाद) की गतिविधि, नुस्पा ग्याद (आठ कार्यकारी शक्ति) तथा खास औषधियों आदि में विनिर्दिष्ट गतिविधि । औषधियों की चिकित्सा क्षमता उपर्युक्त तत्वों पर निर्भर करती है ।