चिकित्सा एवं पथ्यापथ्य

सिध्द साहित्य में कहा गया है कि सही औषधि लिखने के लिए निदान और हेतु विज्ञान कारणों की पहचान मूल रुप से आवश्यक हैं। रोग के कारकों को निम्न प्रकार से समूहबध्द किया गया है:-


1.       तीन मिश्रणों  का संदूषण
2.       नक्षत्रीय प्रभाव
3.       विषाक्त पदार्थ
4.       मानसिक कारण
5.       आध्यात्मिक कारण

6.       वंशागत

रोग के निदान की प्रक्रिया तीन नैदानिक मानदण्डों पर आधारित होती है।


1.       पोरियालारिथल (पाँच ज्ञान इंद्रियों द्वारा परीक्षण)
2.       पुलाना लारिथल (पाँच इंद्रियों द्वारा परीक्षण)
3.       विनाथल (पूछताछ)


आठ प्रकार का वर्गीकरण किया गया है जिससे सही रोग की पहचान की जाती है:-


1.       ना
2.       नीरम
3.       मोझि
4.       विझी
5.       मजहम (मझम)
6.       विझी
7.       नाड़ी
8.       स्पेरिस्म


रोग की पहचान के लिए इनमें से मूत्र की सतह पर तैल प्रसरण विधि के साथ - साथ अन्य मानदण्ड और नाड़ी देखने की विधि बहुत विशिष्ट और अतिसंवेदनशील तरीके है। अन्य कारण यथा गठन या सोमेटो - टाइपिंग,त्रऽतुजनक कारण सह - मृत्युदर का भी पूर्वानुमान तथा रोग की चिकित्सा के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है।


चिकित्सीय पहलू

रोग के सिध्दांतों का वर्गीकरण (व्यक्ति की चिकित्सा में प्रभावी घटक)

 

  • इडेफिक फैक्टर (साईंस ऑफ सोइल)
  • बायोटिक फैक्टर (कान्सटीटयूशनल एण्ड सोमेटो टाइपिंग)
  • सिजनल फैक्टर
  • डाइट,ह्विकल एण्ड एडजुवेंट

 

यदि इन सभी कारणों को नुस्खा लिखते समय ध्यान में रखा जाए तो अनुकूल परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
सोमेटोटाइपिंग या शारीरिक गठन,भूमि और मिट्टी का प्रभाव,त्रऽतु,शारीरिक गठन पर आधारित आहार तथा रोग, वाहन तथा सहायक औषधि आदि रोग के पूर्वानुमान तथा रोग की चिकित्सा में महत्वपूर्ण घटक हैं।


प्रवर्ध्दक पहलू


  • प्रोन्नति के पहलू के रुप में कायाकल्प प्रक्रिया अपनाई जाती है
  • कायाकल्पम (जेरोनटोलोजी) दो प्रकार की है- कल्प योगम् (यौगिक व्यायाम) तथा कल्प अविजथम (औषधि)
  • कल्प अविजयम दो भागों में विभाजित है- सिरप्पु (विशिष्ट) तथा पोथु कर्पम (सामान्य
  • कल्प योगम आठ योग सिध्दांतों द्वारा किया जाता है- लयमम्, नियामम, आसनम, प्रणायमम्, प्रोथयागरम, थारानई, थियानम, समथ्य सामार्थ्य क्षेत्र तथा विशिष्टताएं

सिध्द चिकित्सा पध्दति में विशिष्ट क्षेत्र निम्न प्रकार से है:-


  • थोक्कनम
  •  वर्मम

  • अधिक मात्रा में भेषज निर्माण यथा - चूर्णम, कट्टु,सथु, कझंगु तथा गुरु कुझिगई।


थोक्कनम


थोक्कन (सिध्द चिकित्सा पध्दति में प्रयोग की जाने वाली उपचार प्रक्रियाओं में से एक है। प्रारंभ में इन प्रक्रियाओं का प्रयोग केवल शाही परिवारों में कायाकल्प वृध्दि के लिए किया जाता  था तथा बाद में यह चिकित्सीय अनुप्रयोग में बदल गया। सिध्द में बाह्य चिकित्सा को 32 भागों में वर्गीकृत किया गया है। सभी में से यह एक विलक्षण पध्दति है जिसे नौ अन्य प्रक्रियाओं उपभागों में विभाजित किया गया है वह थोक्कनम है।  थोक्कनम में पूर्ण रुप से उपचारित रोग पर ध्यान दिया जाता है जो कि वात, जो कि शरीर का गतिमूलक बल है, के बढने के कारण होता है।


िध्द त्रिदोष सिध्दांत में कहा गया है कि न्यूरो मस्कुलर और मस्कुलो  स्कैलैटल सिस्टम के शारीरिक क्रियाकलापों के लिए जिम्मेवार सक्रिय बल वात है। थोक्कनम  पित्त के साथ - साथ कफ रोगों के लिए भी लाभकारी है । थोक्कनम अभ्रणशील अनुभूति को समाप्त कर देती है जो कि कफ बढने से होती  है। थोक्कनम दो शब्दों के मिश्रण से बना है - थोक्कु और अनम् 1 थोक्कु का अर्थ है त्वचा अनम् का अर्थ है सहारा वर्ण (आभा) गर्मी (उष्णता) । उस त्वचा,मांसपेशी और स्नायु को ठीक करना जहाँ पर वात है । इसका समानार्थक शब्द है मार्थानम है। प्राचीन काल में मार्थानम का अनुष्ठान मालार्स द्वारा किया जाता था । मालार मार्शल  और मलयुध्द की क्षमता वाली मांसपेशी है।


सिध्द मूल सिध्दांतों के अनुसार मांसपेशियों स्नायुओं,जोड़ों तथा बालों की जड़ सहित त्वचा का संगम स्थान वात ऊर्जा के प्रवाह का स्थान है। वात महत्वपूर्ण ऊर्जा का नि:शेषण के कारण वात होता है? जिसके परिणाम स्वरुप विकार होते है से दर्द,आय परिवर्तन,शक्ति,ऐंठन,मस्तिष्क स्तंभन,कठोरता,सुन्न होना तथा तंत्रिका शोथ  होता है।

वर्मम (वर्मास और एनर्जी ज्वाइंट)


सिध्द दर्शन की दृष्टि से अन्य महत्वपूर्ण घटक वर्म हैं। वर्म शरीर के ऊर्जा स्थान (बिंदु) जो मुख्यत: त्वचा और आसपास के ऊतकों में अवस्थित रहते है। सिध्द विद्वानों के अनुसार इन बिंदुओं (स्थानों) पर चोट के कारण शरीर में  रोग होता है। डा.रोबर्ट बेक्कर ने अपनी पुस्तक  न्न द बॉडी इलैक्ट्रिक न्न में ऊर्जा बिंदुओं (स्थानों) का उत्तम स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया है । प्रत्येक व्यक्ति की नाड़ी में बहने वाली शक्ति (ऊर्जा) बहुत कम वोल्टेज की होती है। त्वचा की सामान्य रोधक क्षमता के अनुसार सांवेदिक क्षमता की कमी के साथ प्रवाह का दूर का तक जाना असम्भव होता है। यहाँ पर वर्म संकेतवर्ध्दक स्टेशन के रुप में कार्य करते हैं । वर्म का कार्य केवल संप्रेषित करने से कहीं ज्यादा है। वर्म नित्यचर्या के रुप में भी कार्य करते है।


सिध्द चिकित्सा की ब्रांच (केंद्र) व्यापक रुप से तमिलनाडु और केरल में अभ्यास करती  है तथा कालारी  की सेनाशासन पध्दति से संबंध्द है, जो कि अभी तक कालारी कहे जाने वाले विशेष स्कूलों में पढाई जाती है। विज्ञान की यह शाखा मानसिक और  एक्सीडेंट संबंधी चोट से संबंधित है।


ऊर्जा के 10 वृहत दशानाड़ी है एवं 72,000- लघु ऊर्जा चैनल (नाड़ी हैं) जिसका संबंध शरीर के विभिन्न कोशिकाओं से है । इन चैनलों के माध्यम  से ऊर्जा प्रभावित होती है और शरीर के विभिन्न केंद्रित निश्चित क्षेत्रों में रहती है । 108 वर्म है जो ऊर्जा को केंद्रित करता है । इन नाड़ी एवं वर्म में ऊर्जा विघटन होने से बीमारी उत्पन्न होती है । ऊर्जा समीक्षा क्रम में अपने मूल रुप में प्रभावित होने की स्थिति में सिध्द चिकित्सक मसाज, परिचालन, शरीर को ढीला करना इसके अतिरिक्त बाह्य एवं आंतरिक वनस्पति एवं वनस्पति खनिज मिश्रण का प्रयोग करते हैं । सिध्द में वर्म विज्ञान इस्टूमेंटल  वैद्य ट्रामा जलन से घायल क्षेत्र एवं मुक्त घायल क्षेत्रों को विकसित करते हैं। मुक्त एवं जलन से घायल घटना में आंतरिक औषधियों के साथ कई स्थानीय औषधियों का प्रयोग किया जाता है। स्थिर एवं पुर्नगति योग्य भूमिका निर्धारण सिध्द वैद्य भारत में अस्थि सुविधा के विकास का प्रयोग करते हैं ।


उच्च भेषजगत विनिर्माण

1.       चूर्णम
2.       कट्ठु
3.       संथु
4.       कझंगु
5.       गुरुकंझंगु