वाङ् मय अनुसंधान


वांड्.मय अध्ययन और इसका पुनरूत्थान एक महत्वपूर्ण सामग्री अनुसंधान कार्यक्रम सुनियोजित करने के लिए है। आयुर्वेद और सिध्द के विषय में इसकी संबंधित साहित्य की पर्याप्त मात्रा में अनुपलब्धि से और अधिक बढ ज़ाती है। अनेक दुर्लभ शात्र - पाण्डुलिपि के रूप में देश के विभिन्न संग्रहालयों और साथ ही साथ व्यक्तिगत अधिकार में उपलब्ध है। परिषद ने अपने साधनों को हराकर इसके सर्वेक्षण (सूक्ष्मतर जाँच), माइक्रोफिल्म (लघु-चित्र), प्रतियाँ तैयार करना संपादन और प्रकाशन की ओर समुचित रूप से लगाया है। अनेको पुस्तकें क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध हैं प्रयास कि इनके संस्कृत अंग्रेजी-संस्करण उपलब्ध कराने प्रक्रिया तेजी से प्रारंभ की जाये।


वांड्.मय/साहित्यिक अनुसंधान आयुर्वेद एवं सिध्द में जो संपन्न हुआ है एक संक्षिप्त प्रतिवेदन निचे दिया जा रहा है।


आयुर्वेद


1. परियोजनाएँ जो वर्ष 1970 - 74 के मध्य कार्यरत थी उनकी उपलब्धियाँ प्रस्तुत है।

वाड्.मय अनुसंधान एकक वाराणसी:- यह एकक जो वैद्य वी.एन.द्विवेदी, परियोजना अधिकारी के अंतर्गत थी, आयुर्वेद की पुस्तकें का एक कैटालाग का संकलन किया जिसमें 653 शीर्षक, वाराणसेय-संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के थे। जिसका उद्देश्य था कि आयुर्वेद में अप्रकाशित पुस्तकों की जानकारी प्राप्त हो जाए।


वाड्.मय अनुसंधान एकक संदर्भ संकलन एकक जामनगर
यह एकक - आचार्य वी.जे.ठक्कर परियोजनाधिकारी के अंतर्गत थी । इस एकक द्वारा अष्टांगसग्रह का प्रकाशन, जो मूलरूप से, संदर्भ संकलन एकक वैद्य वी.नारायण स्वामी, चेन्नई से प्राप्त की गई थी। इसके अतिरिक्त, वाड्.मय पहलूओ को जो नैदानिक अनुसंधान पध्दति तंत्र के वृहतत्रयी, काश्यप संहिता और भेल संहिता में उपलब्ध अध्ययन किये गए।


संदर्भ संकलन एकक पटना:- यह एक वैद्य रामरक्ष पाठक परियोजनाधिकारी, के अंतर्गत थी। इस एक द्वारा आयुर्वेद में दार्शनिक पक्ष के कुछ संदर्भ एकत्र किये।

 

संदर्भ संकलन एकक नई दिल्ली:- यह एक वैद्य हरिदत्त शास्त्रीय, परियोजनाधिकारी के अंतर्गत थी, इस एकक द्वारा चरकसंहिता (प्रकाशित-अप्रकाशित) के विभिन्न टीका/भाष्यों के विस्तृत जानकारी तैयार की तथा चरकसंहिता के संदर्भ संकलन भी एकत्र किये।

 

संदर्भ संकलन एकक - बरहामपुर (उड़िसा) : यह एकक कविराज अनन्तत्रिपाठी शर्मा - परियोजनाधिकारी के अंतर्गत थी इस एकक द्वारा - बाल्मीकि रमायण में आयुर्वेद के संदर्भों का संकलन किया और - इसे बाल्मीकि रामायण में आयुर्वेद नाम पुस्तक प्रकाशित करने में सहयोग मिला।


2. वाड्.मय अनुसंधान एकक (आयुर्वेद तंजौर)


स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार ने 1964 -65 की अवधि में इस एकक की स्थापना, सरस्वती महल पुस्तकालय, तन्जौर में इस उद्देश्य से किया जिससे आयुर्वेद एवं सिध्द में मौलिक सिध्दांत विषयक सामग्री मिल सके। यह एकक, पूर्व सी.आर.आई.एम.एच.द्वारा 1969 -70 में ले ली गई और निम्नलिखित 10 आयुर्वेद की शास्कीय पुस्तकें संकलित/प्रकाशित किया:-


1. -    भेलसंहिता - भेल (प्रकाशित)
2.-     भेषजकल्प - भारद्वाज (प्रकाशित)
3.-     नेत्र प्रकाशिका - नन्द केशनरा (प्रकाशित)
4.-     शतश्लोकी - अभिधान सरस्वती (प्रकाशित)
5.-     धन्वन्तरिसारनिधि - महाराज तुलाजा (प्रकाशित)
6.-     नानविधि वैद्यम (संस्कृत) महाराज तुलाजा (प्रकाशित)
7.-     कौसारतन्त्रम (संस्कृत) रावण (प्रकाशित)
8.-     नेत्ररोगनिदानम् (संस्कृत)(प्रकाशित)
9.-     अश्वचिकित्सा शीलहोम (प्रकाशित)
10.-   सरभेन्द्र वैद्य रत्नावली प्रक्रिया अधारित सरभेन्द्र वैद्य मुराई गल आफ



उपर्युक्त कार्य के अतिरिक्त, निम्नलिखित पुस्तकें भी संकलन/अनुवाद प्रक्रिया में हैं।
रसराज लक्ष्मी विष्णु पंडित (14वीं शताब्दी)
पथ्यापथ्य विवोध द्वारा कैयदेव
चिकित्सा - अमृतसागर - द्वारा देवीदास
अष्टांगहृदय वाङ् मय


प्रासांगिक तौर पर यह उल्लिखित किया जाता है कि रस राज लक्ष्मी पंडित विष्णुदत्त जो 14वीं शताब्दी में उन्नति पर थे और जो चूणामणि द्वारा दृष्टान्त दिया गया है, रसकामधेनु के लेखक, माधव उपाध्यय, आयुर्वेद प्रकाश के लेखक और स्वर्गीय वैद्य हरि प्रपन्न शर्मा शास्त्री, रसयोग सागर के लेखक ये सभी ऐतिहासिक महान विभूतियाँ थीं।

 


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