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वीडियोफिल्म (चलचित्र) (अवधि: 28 मिनिट,मूल्य 100 रूपये/प्रति कापी)
जीवन विज्ञान आयुर्वेद दो शब्दों से बना है आयु (जीवन) और वेद (ज्ञानविज्ञान)। यह एक प्राचीन भारतीय चिकित्सा पध्दति है जो 2500 ई:पूर्व से मानी जाती है। इस चित्र में मूल दार्शनिक ज्ञान एवं प्राचीन निदान पध्दति और रोग चिकित्सा का वर्णन है। पचंमहाभूत के मूल सिध्दान्त, त्रिदोष, सप्तधातु और त्रिमल ये विभिन्न कार्यों के उत्तरदायी है, साथ ही मानव शरीर के निर्वाहक/(सहारा) हैं। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य के संरक्षण और प्रोन्नति, रोगों से बचाव और व्यक्तिपरक स्वस्थवृत को भी इस चित्र में सम्मिलित किया गया है। पंचकर्म सामान्य रूप से शोधन चिकित्सा जानी जाती है इन्हें भी इसके अंतर्गत सम्मिलित किया गया है। पुनरूत्थान (रिसर्जेन्स) केंद्रीय आयुर्वेद सिध्द अनुसंधान परिषद, भारत सरकार की एक शीर्ष संस्था है, जो आयुर्वेद एवं सिध्द चिकित्सा पध्दति के विकास हेतु अनुसंधान कार्य पिछले 30 वर्षों से संचालित कर रही है। इसके अनुसंधान कार्यक्रमों में निदान चिकित्सात्मक अनुसंधान, औषध अनुसंधान और वांड.मय अनुसंधान देश के विभिन्न भागों में स्थित 36 अनुसंधान संस्थानों से संचालित हो रहे हैं। इस चित्र द्वारा परिषद् के अनुसंधान कार्यक्रम उपर्युक्त क्षेत्रों में उसकी उपलब्धियों के साथ प्रकाश में लाया गया है। गुग्गुलु - एक बहुमुखी (प्रभावशाली) औषध गुग्गुलु, औषधपादप कोमिफेरा विट्टी से प्राप्त गोंद। आयुर्वेद में अत्यधिक प्रयुक्त आमवात, संधिवात और अल्प कोलेस्ट्रोमिया की चिकित्सा में प्रयुक्त होती है। अत्यधिक मांग होने के कारण, इसके कृषि संबर्धन संवर्धन पर दबाव पड़ा। इस चित्र में, कृषि संबर्धन संवर्धन में इस बहुमुखी औषध के विभिन्न पहलुओं के साथ औषध पादप से गोंद को प्राप्त करना, इसके संसाधन और अनुसंधान कार्य जो परिषद् द्वारा किये गये उसकी सूचनाओं का विवरण सम्मिलित किया गया है। शिलाजीत एक अनन्त रामबाण/सर्वरोग नाशक औषध शिलाजीत, एक काला चिपचिपा नि:स्राव पहाड़ों की चट्टानों से प्राप्त होता है, इसका आयुर्वेद में विभिन्न रोगों की चिकित्सा में अत्यधिक प्रयोग होता है। इसका प्रयोग रसायन के रूप में बहुत सामान्य है। इस चित्र में शिलाजीत से संबधित विभिन्न पहलुओं, इसके उदभव, शुध्द करने की विधि इत्यादि को दर्शाया गया है। पंचर्कम पंचकर्म, आयुर्वेद में एक अद्वितीय चिकित्सा विधि है, जिसके द्वारा रोग निदान घटकों को मूल से निष्कासन करने और दोषों की साम्यता बनाये रखने हेतु सार्थक बहस की गई है। पंचकर्म द्वारा चिकित्सा रोगियों में रोग के पुनरावर्तन की संभावना बहुत कम हो जाती है। इस चित्र में पंचकर्म विधि उदाहरणार्थ वमन, विरेचन, अनुवासन, निरूहण और नस्य साथ ही केरलीय विशेषताँए जैसे-पिण्डस्वेद, पिञ्झिल, शिरोबस्ति, शिरोधारा और शिरोलेपन का विस्तार से विवरण दिया गया है।
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