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स्वर्णिम त्रिकोणीय संधि


स्वर्णिम त्रिकोणीय संधि

स्वर्णिम त्रिकोणीय साझेदारी की परिकल्पना चित्रकूट में 24 से 26 मई, 2003 तक आयोजित आयुर्वेद अनुसंधान पर राष्ट्रीय कार्यशाला में उत्पन्न हुई जहाँ पर आधुनिक चिकित्सा के समकालीन कार्य पर आधारित पारंपरिक चिकित्सा और आधुनिक चिकित्सा को विशेष बजट की सहायता के साथ आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा के ज्ञान के विकास के लिए एक संपूर्ण प्रौद्योगिकी मिशन की स्थापना का निर्णय लिया गया। तदनन्तर 8 जुलाई,2004 को आयोजित एक बैठक में सचिव,आयुष विभाग, महानिदेशक, सी.एस.आई. और महानिदेशक आई.सी.एम.आर. ने पहचान किए गए रोगों की अवस्था और आयुर्वेदिक एवं वानस्पतिक उत्पादों, राष्ट्रीय सार्वभौम महत्व के रोगों की अवस्था में, सुरक्षित, प्रभावकारी और मानकीकृत शास्त्रीय आयुर्वेदिक उत्पादों को प्राप्त करने के लिए एक साथ कार्य करने का निर्णय लिया। यह भी निर्णय लिया गया कि एकल,बहु-वानस्पतिक और वानस्पतिक-खनिज उत्पादों और बौध्दिक संपदा अधिकार की क्षमता वाले उत्पादों के विकास के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाए।


जी.टी.पी. योजना की शीर्षस्थ समिति ने अपनी दिनांक 18.10.2005 की बैठक में सिध्द, यूनानी और होम्योपैथी को जी.टी.पी के अंतर्गत औषधि विकास में शामिल करने का निर्णय लिया। इस संबंध में एचआईवी/एड्स के गहन-चिंतन सत्र में सिध्द औषधियों की पहले ही पहचान कर ली गई है। शीर्षस्थ समिति के सुझावों के अनुसार संबंधित टास्कफोर्स को रोग विशिष्ट तथा पध्दति तटस्थ होना चाहिए। जी.टी.पी. योजना, आयुष विभाग के अधीनस्थ अनुसंधान परिषदें-केंद्रीय आयुर्वेद एवं सिध्द अनुसंधान परिषद् (सी.सी.आर.ए.एस.), केंद्रीय यूनानी चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (सी.सी.आर.यू.एम.), केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद् (सी.सी.आर.एच.) निम्नलिखित उद्देश्यों को पाने के लिए दो अन्य प्रमुख साझेदारों यथा (सी.एस.आई.आर.) और (आई.सी.एम.आर.) के साथ कार्य करेंगी।

उद्देश्य:

 

  1. पहचान किए गए रोगों की अवस्था के लिए सुरक्षित प्रभावकारी और मानकीकृत आयुर्वेद, सिध्द, होम्योपैथी और यूनानी (ए.एस.एच.यू) उत्पादों को बनाने के लिए।
  2. राष्ट्रीय सार्वभौम महत्व के रोगों की अवस्था में प्रभावकारी नये आयुर्वेदिक/सिध्द/यूनानी/होम्योपैथिक उत्पादों का विकास करना। इन उत्पादों को उस प्रकार की रोग की अवस्था में बाजार में उपलब्ध उत्पादों से अधिक होना चाहिए।

  3. उत्तम गुणवत्ता, सुरक्षित और प्रभावकारिता आदि मानदण्ड होंगे। ऐसा तंत्र होगा जो उत्पादों को घरेलू बाजार में समर्थ बना सके।
  4. एकल और बहु-वानस्पतिक उत्पादों के विकास को सार्वभौमिक रुप से स्वीकार्य बनाने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाए।
  5. आधुनिक पध्दतिआधुनिक विज्ञान के संस्थानों के साथ आयुष के सहयोगी अनुसंधान को बढावा देना।

 

समय सीमा:

 

सभी उद्देश्यों को एक लक्ष्य के रुप में पाँच वर्ष की अवधि में पूरा करना है।

 

टिप्पणी:

 

जी.टी.पी. योजना के प्रारंभ में पहचान किए गए रोगों की संख्या 12 थी, जो अब बढकार संशोधित योजना में 28 हो गई है। इसके अतिरिक्त सामान्य रुप से प्रयोग किए जा रहे आठ रसयोगों (वानस्पतिक-खनिज धात्विक योगों) का मानकीकण, सुरक्षा तथा विषाक्तता अध्ययन हेतु पहचान की गई है तथा और रसयोगों को भी शामिल किया जा रहा है। क्योंकि कार्य की मात्रा लगभग दुगनी हो गई है अत: इन सभी परियोजना को लागू करने के कुल समय में भी आनुपातिक वृध्दि होगी। सिध्द यूनानी और होम्योपैथी को शामिल करने के कारण परियोजना के लिए व्यय और अवधि को आवश्यकतानुसार बढाया जाए।

 

 


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