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चिकित्सा एवं पथ्यापथ्य आयुर्वेद में शिक्षा की प्रक्रिया, अनुसंधान एवं चिकित्सा अभ्यास अनुभवों एवं वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। अन्य प्राचीन भारतीय ज्ञान ग्रहण की विधाओं की तरह आयुर्वेद भी ज्ञान ग्रहण एवं प्रत्यक्ष ज्ञान, अनुमान, आप्तोपदेश, युक्ति आदि प्रमाणों की विधाओं से आविष्कृत हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति का एक निश्चित शारीरिक एवं मानसिक संरचना है जो कि प्रत्येक व्यक्तियों में स्वास्थ्य या व्याधि उत्पादन के लिए उत्तरदायी है। आयुर्वेद का प्रकृति परीक्षा का सिध्दांत आहार, औषधि एवं चिकित्सा के चयन के समय शारीरिक एवं मानसिक संरचना को जानने में प्रयुक्त होता है। मानव मन के तीन घटक है, सत्व, रज, तम। जो कि जीवविज्ञानीय घटकों यथा वात, पित्त, कफ के साथ एक दूसरे को प्रभावित करतें है। तथा मनोदैहिक संरचना (प्रकृति) को सुनिश्चित करते है। आयुर्वेद में रोगों का निदान दो पहलुओं पर आधारित है 1. रोगी परीक्षा 2. रोग परीक्षा अत: रोगी परीक्षा व्यक्ति के शारीरिक संरचना से एवं व्यक्ति के स्वास्थ्य तथा जीवनशक्ति की स्थिति से संबंधित है। यह दशविध परीक्षाऍँ - रोगी का सामान्य परीक्षण अष्टविध परीक्षा द्वारा किया जाता है। यथा नाड़ी, मूत्र, मल, जिह्वा शब्द, स्पर्श, दृष्टि एवं आकृति। इनके अतिरिक्त स्रोतस एवं अग्नि की परीक्षा को भी ध्यान में रखा जाता है। आयुर्वेद में शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा इन चारों के संयोग को आयु कहा गया है। त्रिदोष, अग्नि, सप्तधातु एवं तीन मल इनके सन्तुलन की अवस्था को स्वस्थ्य के रुप में परिभाषित किया गया है। आयुर्वेद में स्वास्थ्य के संरक्षण, संवर्धन एवं रोगों से प्रतिरक्षा एवं उनका निवारण करने पर विशेष जोर दिया गया है। आयुर्वेद में वैयत्तिक स्वथ्यवृत्त पर विस्तृत वर्णन उपलब्ध है। जिसमें दिनचर्या, रात्रि चर्या, ऋतुचर्या एवं सद् वृत सम्मिलित है। धारणीय तथा अधारणीय वेगों से संबंधित निश्चित नियमों का अनुपालन अच्छें स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। आयुर्वेद के अनुसार आदर्श चिकित्सा वह है जो व्याधि का निवारण बिना किसी दुष्प्रभाव के करें। तीन प्रकार की शास्त्रीय चिकित्साओं का उल्लेख आयुर्वेद में मिलता है दैव व्यपाश्रय चिकित्सा, युक्ति व्यपाश्रय चिकित्सा एवं सत्वावजय चिकित्सा। आयुर्वेदिक चिकित्सा चार प्रकार से की जाती है 1. संशमन 2. संशोधन पंचकर्म 3. निदान परिवर्जन 4. पथ्य व्यवस्था आयुर्वेदिक चिकित्सा मुख्य रुप से वानस्पतिक द्रव्यों पर आधारित है कभी-कभी वानस्पतिक द्रव्यों, धातुओं, खनिजों या अन्य प्राकृतिक रुप से मिलने वाले पदार्थो का सम्मिश्रित प्रयोग होता है तथा विशिष्ट आयुर्वेदिक शास्त्रीय प्रक्रियाओं के द्वारा औषध योग तैयार कियें जातें हैं। अनेक प्रक्रियाओं के द्वारा इस प्रकार के योगों को विषाक्तता रहित एवं सामर्थ्यवान बनाया जाता है। औषध चिकित्सा के साथ-साथ पथ्य (समुचित आहार-विहार) का भी निर्देश है। आहार चिकित्सा उतनी ही अधिक महत्व पूर्ण है जितनी की औषध चिकित्सा क्योंकि इसके द्वारा शीघ्र ही स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है। |
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