उद्‍गम

आयुर्वेद का अर्थ है जीवन का विज्ञान। यह दो शब्दों के योग से बना है आयु (जीवन) एवं वेद (ज्ञान)। यह ज्ञान सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने दक्ष प्रजापति को दिया। दक्ष प्रजापति ने अश्विनी कुमारों को पढाया। अश्विनी कुमारों ने स्वर्ग में इस विज्ञान को इन्द्र को सिखाया, प्रारंभिक वैदिक समय से ही दैविक चरित्रों का उल्लेख मिलता है। जब से मानव जाति विभिन्न रोगों से पीड़ित होना प्रारंभ हुई, तब भारद्वाज जैसे बुध्दिमान मानव ने इन्द्र से चिकित्सा का ज्ञान सीखा।


वेदों में रोगों का संदर्भ, रोग मुक्ति एवं स्वास्थ्य से संबंधित कई तथ्य पाये जाते है। पृथ्वी पर (6000 ई.पू.) बुध्दिमानो का सारगर्भित प्राचीन अभिलेख मिलता है। आज आयुर्वेद के ज्ञान के मुख्य स्रोत के रूप में दो ग्रंथ समूह उपलब्ध है। जिसमें प्रत्येक में तीन पुस्तकों का समावेश है।


  1. यथा 1. बृहत्त्रयीतीन प्रमुख बृहत् ग्रन्थ
    • चरक संहिता (1500 -1000 वर्ष ई.पू.)
    • सुश्रुत संहिता (1500 -1000 वर्ष ई.पू.)
    • वाग्भट्ट (600 वर्ष ई.प.)
  2. लघुत्रयीतीन प्रमुख लघु ग्रंथ
    • माधव निदान (700 वर्ष ई.प.)
    • शांर्गधर संहिता (1300 वर्ष ई.प.)
    • भाव प्रकाश (1600 वर्ष ई.प.)

इन प्रमुख ग्रंथों के अतिरिक्त कई ग्रंथ है जो प्राचीन एवं समकालीन है जिसमें भारतीय चिकित्सा पध्दति पर सूचनाओं का चित्रण है।