आयुर्वेद एवं सिध्द में अनुसंधान की मौलिकता

 

आयुर्वेद एवं सिध्द चिकित्सा पध्दति इस देश में प्राचीनकाल से ही प्रचलितरही हैं और भारत के अधिकांश लोगों की चिकित्सा आवश्यकताओं की आपूर्ति करती रही हैं । ये चिकित्सा पध्दतियाँ - प्राचीन चिकित्सक विद्वानों द्वारा उनकी अपनी दार्शनिकपूर्वी चिकित्सा विधियों और उसकाल में प्रचलित चिकित्सा अभ्यासों के आधार पर प्रसिध्दि को प्राप्त हुईं और लगभग सभी पहलुओं से चिकित्सा प्रणाली का पूर्ण रूप लिया । विदेशी आक्रमणों के आगमन और एक दूसरे के सांस्कृतिक पारस्परिक सद्भाव द्वारा निश्चित रूप से इन चिकित्सा प्रणालियों पर जोरदार प्रभाव पड़ा। केवल ब्रिटिश लोगों ने इन देशी प्रणालियों को उत्साहित नहीं किया।


21वीं शताब्दी के प्रारंभ में इन चिकित्सा पध्दतियों के पुनरूध्दार के प्रयास  हुए ।  शाही विधान परिषद् ने इनके अन्वेषणों को करने का प्रस्ताव पारित किया और इन चिकित्सा पध्दतियों को वर्ष 1916 में स्वीकार कर मान्यता प्रदान की गई । भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी वर्ष 1920 में एक ऐसा प्रस्ताव पारित किया । इसी आधार पर आयुर्वेद के अनेकों महाविद्यालयों की स्थापना हुई।


स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद - अनुसंधान विकास के प्रयास को गति मिली । कुछ एक चयनित महाविद्यालयों की परियोजनाओं को आर्थिक - अनुदान विभिन्न समितियों के अनुमोदन पर प्राप्त हुआ । केंद्रीय आयुर्वेदिक अनुसंधान परिषद् - एक परामर्शदात्री समिति के रूप में वर्ष 1962 में स्थापित हुई और अंत में भारतीय चिकित्सा पध्दति एवं होम्योपैथी की अनुसंधान परिषद (सी.सी.आर.आई.एम.एच) की स्थापना  वर्ष 1969 में हुई । देंश के विभिन्न भागों में भारतीय चिकित्सा पध्दति एवं होम्योपैथी की अनुसंधान परियोजनाओं का सूत्रिपात हुआ और राष्ट्रीयस्तर पर प्रथम बार समन्वय प्रारंभ किया गया ।


आयुर्वेद एवं सिध्द चिकित्सा पध्दति को वैज्ञानिक स्तर पर लाकर उसको व्यवस्थित,समन्वय और विकास करने हेतु सी.सी.आई.एम.एच को पुनर्गठित कर केंद्रीय आयुर्वेद एवं सिध्द अनुसंधान परिषद् (सी.सी.आर.ए.एस.) एक शीर्ष निकाय का गठन, मार्च 1978 में किया गया । परिषद की शासी निकाय का अध्यक्ष पद स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के मंत्री पदेन करते हैं और संयुक्त सचिव - स्थायी वित्त समिति की अध्यक्षता करते हैं ।


वैज्ञानिकअनुसंधान कार्यक्रम की देख - रेख संबध्द वैज्ञानिक परामर्शदात्री समिति के सुप्रसिध्द विद्वान चिकित्सक करते हैं


परिषद् अपने अनुसंधान कार्यक्रमों को लगभग 30 बड़े संस्थानकेंद्रों   - के द्वारा संपन्न करती है । परिषद् मुख्यालय इन पर नियंत्रण,निर्देशन और देख - रेख के लिए उत्तरदायी है । सी.सी.आर.ए.एस. 33 संस्थानोंकेंद्रों द्वारा पुनर्गठित कर दी गई है । परिषद् का अनुसंधान कार्य 1205 अधिकारियोंकर्मचारियों द्वारा किया जाता है जबकि उसी स्वीकृत संख्या 2319 है ।


परिषदान्तर्गत अनुसंधान कार्यक्रम विस्तार पूर्वक:-


निदान चिकित्सात्मक अनुसंधान - स्वास्थ्य रक्षा अनुसंधान सहित,औषध अनुसंधान,पादप सर्वेक्षण और कृषि संबर्धन सहित,औषध मानकीकरण भेषजगुण विज्ञानीय और विषाक्तता अध्ययन, वांड्.मय अनुसंधान,प्रलेख केंद्र और प्रकाशन सहित तथा परिवार कल्याण अनुसंधान - नैदानिक और प्रायोगिक www.ccras.nic.in वेबसाइट में परिषद द्वारा 30 वर्षो में किये गये महत्वपूर्ण उपलब्धियों और अति महत्वपूर्ण कार्य जो गतिमान है उन पर जानकारी दी गई है ।